अध्याय-3. बंधुत्व, जाति तथा वर्ग: आरंभिक समाज
📅 Date: 24 February 2026 (Tuesday)
महाभारत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय समाज (लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी) की जीवन शैली का सबसे बड़ा दस्तावेज है। इसमें एक लाख से अधिक श्लोक हैं जो विभिन्न सामाजिक श्रेणियों और परिस्थितियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। इस अध्याय में हम महाभारत के माध्यम से उस समय के बंधुत्व, जाति और वर्ग व्यवस्था का गहन अध्ययन करेंगे।
1. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण
1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में एक परियोजना शुरू हुई। इसका उद्देश्य देश के विभिन्न भागों से महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित करना और उनका तुलनात्मक अध्ययन करना था।
- समय: इस परियोजना को पूरा करने में 47 वर्ष लगे।
- परिणाम: 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंडों में इसका प्रकाशन हुआ।
महाभारत की संस्कृत वेदों की तुलना में सरल है। इसकी विषयवस्तु दो भागों में बंटी है:
1. आख्यान: कहानियों का संग्रह (जैसे कौरव-पांडव युद्ध)।
2. उपदेशात्मक: सामाजिक आचार-विचार और मानदंडों का चित्रण (जैसे भगवद्गीता)।
2. महाभारत का रचयिता: एक या अनेक?
- परंपरागत मत: महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ की रचना की और श्रीगणेश ने इसे लिखा।
- ऐतिहासिक मत: इसकी रचना 1000 वर्षों (500 ई.पू. से 400 ई.) तक होती रही, इसलिए इसके कई रचयिता थे।
- सूत (Suta): मूल कथा के रचयिता संभवतः 'भाट सारथी' थे जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय गाथाएँ लिखते थे।
3. हस्तिनापुर की खोज
क्या महाभारत का हस्तिनापुर वास्तविक था? इसकी जाँच के लिए पुरातात्विक प्रयास किए गए।
- उत्खनन: 1951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ (उ.प्र.) के हस्तिनापुर गाँव में खुदाई की।
- साक्ष्य: यहाँ आबादी के पाँच स्तर मिले। दूसरे और तीसरे स्तर में कच्ची ईंटों के घर, सरकंडों की दीवारें (जिन पर मिट्टी का पलस्तर था) और जल निकासी के लिए ईंटों के नाले मिले।
4. विवाह और परिवार (Kinship & Marriage)
परिवार (Family)
संस्कृत ग्रंथों में 'कुल' शब्द परिवार के लिए और 'जाति' शब्द बांधवों (रिश्तेदारों) के बड़े समूह के लिए प्रयुक्त होता है।
- पितृवंशिकता: वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र आदि से चलती है (महाभारत इसी पर आधारित है)।
- मातृवंशिकता: जहाँ वंश परंपरा माँ से जुड़ी होती है (जैसे सातवाहन शासक)।
विवाह के नियम
लगभग 500 ई.पू. से धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों (जैसे मनुस्मृति) में विवाह के नियम तय किए गए।
- अंतर्विवाह: समूह या गोत्र के भीतर विवाह।
- बहिर्विवाह: गोत्र से बाहर विवाह (इसे उत्तम माना गया)।
- बहुपत्नी प्रथा (Polygamy): एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ (राजाओं में प्रचलित)।
- बहुपति प्रथा (Polyandry): एक स्त्री के अनेक पति (उदाहरण: द्रौपदी)।
मनुस्मृति में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं। इनमें से पहले चार 'उत्तम' माने जाते थे (जैसे कन्यादान), जबकि बाकी चार (जैसे गंधर्व या राक्षस विवाह) निंदित माने गए।
5. गोत्र व्यवस्था
लगभग 1000 ई.पू. से ब्राह्मणों ने लोगों को गोत्रों में वर्गीकृत किया।
- प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।
- नियम 1: विवाह के बाद स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति का गोत्र अपनाना पड़ता था।
- नियम 2: एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।
सातवाहन शासकों (जैसे गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि) के अभिलेखों से पता चलता है कि उनकी रानियों ने विवाह के बाद भी अपने पिता का गोत्र (जैसे गोतमी, वसिष्ठी) कायम रखा। यह ब्राह्मणीय नियमों के विपरीत था।
6. वर्ण और जाति व्यवस्था
वर्ण व्यवस्था (Varna System)
धर्मशास्त्रों में चार वर्णों के लिए आदर्श जीविका तय की गई थी:
- ब्राह्मण: वेदों का अध्ययन, यज्ञ करना और दान लेना।
- क्षत्रिय: युद्ध करना, प्रजा की रक्षा और न्याय करना।
- वैश्य: कृषि, गौ-पालन और व्यापार (वणिक)।
- शूद्र: तीनों उच्च वर्णों की सेवा करना।
- मौर्य: बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय मानते हैं, लेकिन ब्राह्मणीय ग्रंथ उन्हें 'निम्न' कुल का मानते हैं।
- शुंग और कण्व: मौर्यों के उत्तराधिकारी, जो ब्राह्मण थे।
- सातवाहन: इन्होंने स्वयं को 'अनूठा ब्राह्मण' कहा और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया।
- शक (Sakas): मध्य एशिया से आए ये शासक 'म्लेच्छ' (बर्बर) माने जाते थे, लेकिन इन्होंने भी शासन किया (जैसे रुद्रदामन)।
- गाँव के बाहर रहना।
- फेंके हुए बर्तनों का इस्तेमाल करना।
- मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण पहनना।
- वधिक (Executioner) और अंत्येष्टि का काम करना।
- प्रारंभ में मानव और प्रकृति शांति में रहते थे।
- जब समाज में लालच और हिंसा बढ़ी, तो लोगों ने मिलकर एक व्यक्ति (महासंमत्त) को चुना जो व्यवस्था बनाए रखे।
- बदले में लोग उसे अपनी उपज का हिस्सा (कर) देते थे।
- निष्कर्ष: राजा का पद दैवीय नहीं, बल्कि मानवीय चयन पर आधारित है।
जाति (Jati)
वर्ण केवल चार थे, लेकिन जातियाँ असंख्य थीं। जाति भी जन्म पर आधारित थी। जो समुदाय (जैसे निषाद, स्वर्णकार) चार वर्णों में समाहित नहीं हो पाए, उन्हें जाति का दर्जा दिया गया। एक ही व्यवसाय वाले लोग 'श्रेणी' में संगठित होते थे (जैसे मंदसौर के रेशम बुनकर)।
7. अक्षत्रिय राजा और एकीकरण
शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे, लेकिन इतिहास में इसके कई अपवाद हैं:
8. अस्पृश्यता और अंत्यज
वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोगों को 'अंत्यज' (अंतिम में जन्म लेने वाले) कहा गया।
चाण्डाल (Chandalas)
मनुस्मृति में इनके कर्तव्यों की सूची है:
चीनी यात्रियों का विवरण: फा-शिएन (5वीं सदी) ने लिखा है कि अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर आना पड़ता था ताकि लोग उनसे दूर रहें। श्वैन-त्सांग (7वीं सदी) ने भी उनकी दयनीय स्थिति का वर्णन किया है।
9. संपत्ति के अधिकार (Gender & Property)
पैतृक संपत्ति
मनुस्मृति के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद जायदाद सभी पुत्रों में बराबर बँटती थी, लेकिन ज्येष्ठ पुत्र को विशेष भाग मिलता था। स्त्रियाँ इस संपत्ति की हकदार नहीं थीं।
स्त्रीधन
विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व होता था, इसे 'स्त्रीधन' कहा जाता था। इसे उसकी संतान विरासत में पा सकती थी, लेकिन पति का इस पर अधिकार नहीं होता था।
यह अभिलेख (5वीं सदी ई.) रेशम बुनकरों की एक श्रेणी का वर्णन करता है जो गुजरात (लाट) से मंदसौर (दशपुर) आए थे। उन्होंने अपने शिल्प से अर्जित धन से सूर्य देवता का एक भव्य मंदिर बनवाया था। यह श्रेणियों की जटिल सामाजिक स्थिति को दर्शाता है।
10. सामाजिक अनुबंध: बौद्ध अवधारणा
बौद्ध ग्रंथों (सुत्तपिटक) ने वर्ण व्यवस्था के दैवीय सिद्धांत को खारिज कर दिया। उन्होंने 'सामाजिक अनुबंध' (Social Contract) का सिद्धांत दिया:
